यह सिर्फ विरोध करने वाली पीढ़ी नहीं है, यह जवाब मांगने वाली पीढ़ी है
जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ को देखकर बहुत से लोगों ने कहा—“आज की Gen Z को आखिर समस्या क्या है?”
कुछ ने उन्हें गुस्सैल कहा, कुछ ने अनुशासनहीन, कुछ ने सोशल मीडिया की उपज और कुछ ने राजनीति से प्रभावित भी बताया। लेकिन शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि Gen Z इतनी नाराज़ क्यों है?
सवाल यह होना चाहिए कि हमने इस पीढ़ी को इतना बेचैन क्यों कर दिया है?
हालिया जंतर-मंतर आंदोलन में छात्रों और युवाओं ने NEET और परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाई। लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन केवल एक परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे की मांग से बड़ा दिखाई देने लगा। Instagram, memes और reels के जरिए शुरू हुई नाराज़गी सड़क तक पहुंची और हजारों युवाओं को एक जगह ले आई।
यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
Gen Z की पहली बड़ी समस्या—भविष्य की अनिश्चितता
आज का युवा पढ़ता है तो इसलिए कि उसे नौकरी मिलेगी।
नौकरी की तैयारी करता है तो इसलिए कि जिंदगी सुरक्षित होगी।
लेकिन जब वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षा में पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी, परीक्षा रद्द होने या परिणाम को लेकर विवाद सामने आता है, तो सिर्फ एक परीक्षा खराब नहीं होती।
उस युवा का भरोसा टूटता है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगाता है। परिवार पैसा लगाता है। मां-बाप अपनी इच्छाएं रोकते हैं। बच्चा दोस्तों, रिश्तेदारों और सामाजिक जीवन से दूर रहता है।
और फिर अगर उसे लगता है कि व्यवस्था ही निष्पक्ष नहीं है, तो उसकी नाराज़गी सिर्फ सरकार से नहीं होती।
उसे लगता है कि उसके साथ समय ने धोखा किया है।
दूसरी समस्या—डिग्री है, लेकिन रास्ता साफ नहीं
आज Gen Z के पास पहले की किसी भी पीढ़ी से ज्यादा जानकारी है।
उसके हाथ में स्मार्टफोन है।
वह दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी, कंपनी या देश के बारे में कुछ मिनट में जान सकता है।
वह देख सकता है कि दुनिया में उसके जैसे युवा क्या कर रहे हैं।
लेकिन इसी तुलना ने उसकी बेचैनी भी बढ़ाई है।
LinkedIn पर कोई 23 साल की उम्र में करोड़ों की कंपनी बना रहा है।
Instagram पर कोई 21 साल में influencer बनकर लाखों कमा रहा है।
YouTube पर कोई घर से अपना career बना रहा है।
और दूसरी तरफ लाखों युवा सरकारी नौकरी की एक सीट के लिए वर्षों से तैयारी कर रहे हैं।
यह तुलना हमेशा वास्तविक नहीं होती, लेकिन मानसिक दबाव वास्तविक होता है।
तीसरी समस्या—नौकरी से ज्यादा जरूरी है सम्मान
Gen Z सिर्फ नौकरी नहीं चाहती।
वह चाहती है कि उसे सुना जाए।
पुरानी पीढ़ियों में अक्सर यह कहा जाता था—
“बड़ों की बात मानो।”
“समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।”
“पहले नौकरी लगने दो, फिर देखना।”
लेकिन Gen Z का सवाल है—
“कब?”
यह पीढ़ी सवाल पूछने में संकोच नहीं करती।
उसे authority सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं है क्योंकि सामने वाला बड़ा है।
वह पूछती है—
“क्यों?”
और लोकतंत्र में यह “क्यों” बहुत महत्वपूर्ण है।
चौथी समस्या—सोशल मीडिया वरदान भी है और दबाव भी
Gen Z का जीवन online और offline के बीच बंटा हुआ नहीं है।
दोनों लगभग एक ही दुनिया बन चुके हैं।
जंतर-मंतर आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण रहा। जहां पारंपरिक भाषणों और नारों के साथ memes, Instagram reels, music और creative posters भी आंदोलन का हिस्सा बने।
यह नई राजनीति की भाषा है।
जहां पहले हजार लोगों तक पहुंचने के लिए मंच, पोस्टर और अखबार चाहिए थे, वहां आज एक smartphone काफी है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
सोशल मीडिया लगातार यह एहसास पैदा करता है कि बाकी सब लोग आगे निकल रहे हैं और हम पीछे रह गए हैं।
FOMO—Fear of Missing Out—इस पीढ़ी की एक बड़ी मानसिक चुनौती बन चुका है।
पांचवीं समस्या—अकेलापन
विडंबना देखिए।
Gen Z सबसे ज्यादा connected generation है।
लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेली भी।
हजारों followers हो सकते हैं।
सैकड़ों contacts हो सकते हैं।
हर समय notifications आ सकते हैं।
फिर भी किसी युवा को रात में यह महसूस हो सकता है कि उसकी बात सचमुच सुनने वाला कोई नहीं है।
और यही कारण है कि जब कोई आंदोलन उसे यह एहसास देता है कि—
“मैं अकेला नहीं हूं”
तो वह उसके साथ जुड़ जाता है।
जंतर-मंतर पर कई युवाओं ने सिर्फ भाषण नहीं सुने। उन्होंने एक-दूसरे के साथ समय बिताया, खाना बांटा, स्वयंसेवा की और कठिन परिस्थितियों में आंदोलन को बनाए रखा।
यानी वहां सिर्फ गुस्सा नहीं था।
वहां belonging की तलाश भी थी।
लेकिन Gen Z को भी खुद से कुछ सवाल पूछने होंगे
इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
हर विरोध सही नहीं होता।
हर viral video सच नहीं होता।
हर influencer नेता नहीं होता।
और हर गुस्सा आंदोलन नहीं बन सकता।
जंतर-मंतर पर जहां बड़ी संख्या में युवाओं ने जिम्मेदारी और अनुशासन का परिचय दिया, वहीं कुछ घटनाओं में अभद्र भाषा और हिंसक व्यवहार की आलोचना भी हुई।
यही वह जगह है जहां Gen Z को सावधान रहना होगा।
व्यवस्था से सवाल करना लोकतंत्र है।
लेकिन भीड़ बन जाना लोकतंत्र नहीं है।
अपनी बात मजबूती से रखना जरूरी है।
लेकिन विरोध करने वाले से असहमति रखने वाले को दुश्मन समझना खतरनाक है।
सरकारों के लिए भी जंतर-मंतर का संदेश साफ है
युवा को सिर्फ “देश का भविष्य” कहकर काम नहीं चलेगा।
उसे आज का नागरिक मानना होगा।
उसकी परीक्षा आज है।
उसका रोजगार आज का सवाल है।
उसका mental pressure आज है।
उसके परिवार की आर्थिक चिंता आज है।
इसलिए उसके सवालों के जवाब भी आज चाहिए।
सरकार चाहे किसी भी दल की हो, यदि युवाओं को बार-बार यह महसूस होने लगे कि उनकी मेहनत और व्यवस्था के बीच कोई संबंध नहीं है, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
असली सवाल यह नहीं कि Gen Z सड़कों पर क्यों आई
असली सवाल यह है कि—
क्या हम उस पीढ़ी को सुन रहे हैं जो पहली बार इतनी खुलकर कह रही है कि उसे सिर्फ अवसर नहीं, निष्पक्ष अवसर चाहिए?
उसे सिर्फ नौकरी नहीं, सम्मान चाहिए।
उसे सिर्फ भाषण नहीं, जवाब चाहिए।
उसे सिर्फ आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उसे यह भरोसा चाहिए कि अगर वह ईमानदारी से मेहनत करेगी तो व्यवस्था उसके खिलाफ खड़ी नहीं होगी।
जंतर-मंतर पर उठी आवाज को केवल “एक protest” मानकर भूल जाना आसान है।
लेकिन शायद यह उससे कहीं बड़ी कहानी है।
यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसके पास smartphone है, दुनिया की जानकारी है, सवाल पूछने का साहस है—लेकिन अपने भविष्य को लेकर उतनी ही गहरी चिंता भी है।
Gen Z को खारिज करने की जरूरत नहीं है।
उसे समझने की जरूरत है।
क्योंकि आज जो युवा जंतर-मंतर पर सवाल पूछ रहा है,
कल वही इस देश की अर्थव्यवस्था चलाएगा, संस्थाएं संभालेगा, कंपनियां बनाएगा, वोट देगा और नेतृत्व करेगा।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि—
“Gen Z को क्या समस्या है?”
शायद सवाल यह है—















